Only the mercy of GOD.

खुदा-गॉड-भगवान का चुनौती भरा सत् सन्देश

ऐ मेरे बन्दे ! ''मैं'' शरीर-जिस्म-बॉडी नहीं हूँ; ''मैं'' आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह-नूर-सोल-स्पिरिट भी नहीं हूँ-- ''मैं'' समस्त संसार सहित शरीर-जिस्म-बॉडी एवं जीव-रूह-सेल्फ और आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह-नूर-सोल-स्पिरिट का परमपिता परमेश्वर-खुदा-गॉड- भगवान् या सर्वोच्च शक्ति-सत्ता हूँ ।

ऐ मेरे जिज्ञासुओं ! ''मैं'' ॐ (Oan) नहीं हूँ; ''मैं '' सोऽहँ तो बिल्कुल ही नहीं हूँ; हँऽसो भी नहीं हूँ-- ''मैं'' तो परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप 'अल्लिफ-लाम्-मीम' (अलम्) रूप 'शब्द-वर्ड' (गॉड) परमेश्वर हूँ। सर्वतत्त्व का एकीरूप परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप 'शब्द-वर्ड-गॉड' (बचन) रूप हूँ ।

ऐ मेरे जिज्ञासुओं ! ''मैं'' कभी भी शरीर-जिस्म-बॉडी नहीं बना हूँ; और आज भी ''मैं'' शरीर-जिस्म-बॉडी नहीं बना हूँ । ''मैं'' तो सदा-सर्वदा अपने परम आकाश रूप परमधाम-पैराडाइज-बिहिश्त में रहता हूँ। समय - समय पर ''मैं'' सृष्टि के महानिरीक्षक नारद-जिब्रील अमीन, विधायक रूप उत्पत्ति कर्ता ब्रम्हा एवं न्यायाधीश रूप संहार कर्ता शंकर के करुण पुकार पर ही अपने निवास रूप परम आकाश रूप परमधाम से भू-मण्डल (इस धरती रूप धराधाम) पर अवतरित होता हूँ और बिना किसी को जनाये-बताये गुप्तरूप से किसी शरीर को अधिग्रहीत (धारण) कर उस शरीर के जीव-रूह-सेल्फ और आत्मा-ईश्वर- ब्रम्ह-नूर-सोल-स्पिरिट को अपने परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् में विलय कर लेता हूँ तथा उस शरीर विशेष के माध्यम से ' तत्त्वज्ञान (खुदाई इल्म-हुरूफमुकत्तआत) ' रूप नॉलेज (True, Supreme and Perfect KNOWLEDGE) रूप सत्य सनातन धर्म की स्थापना करने हेतु अपने शरणागत परम जिज्ञासुओं को ' तत्त्वज्ञान ' रूप सत्यज्ञान के द्वारा अपनी यथार्थत: जानकारी-दर्शन तथा बात-चीत करते-कराते हुए अपना पूर्ण परिचय-पहचान देता हूँ । यही मेरा पूर्ण परिचय प्राप्ति-पहचान ही यथार्थत: ' सत्य सनातन धर्म ' है । मेरे इस परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् की जानकारी, दर्शन तथा बात-चीत करते हुए पहचान रूप पूर्ण परिचय, सत्ययुग में श्रीविष्णुजी वाली शरीर से, त्रेतायुग में श्रीरामजी वाली शरीर से तथा द्वापर में श्रीकृष्णजी वाली शरीर द्वारा ''मैं'' ने ही दिया था और आज भी पुन: उसी प्रकार से उसी परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रम्ह- खुदा-गॉड-भगवान या सर्वोच्च-सर्वोत्कृष्ठ परमशक्ति-सत्ता रूप अपने ''तत्त्वम् रूप 'शब्द' (बचन)'' की जानकारी, दर्शन तथा बात-चीत करते हुये पहचान रूप अपना पूर्ण परिचय देता या कराता हूं। यह मेरी बात परम आश्चर्यमय होते हुये भी परमसत्य है ।

( 'आदि में 'शब्द' था । 'शब्द' परमेश्वर के साथ था । 'शब्द' ही परमेश्वर था । 'शब्द' देहधारी होकर हम लोगों के बीच डेरा किया --बाइबल से । )

ऐ मेरे बन्दों ! परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप ''मै'' सत्ययुग वाले श्रीविष्णु नहीं हूँ बल्कि श्रीविष्णु वाले परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् हूँ; ''मैं'' त्रेतायुग वाला श्रीराम नहीं हूँ बल्कि श्रीराम वाला परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् हूँ; ''मैं'' द्वापरयुग वाला श्रीकृष्ण नहीं हूँ बल्कि श्रीकृष्ण वाला परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् हूँ । पुन: वर्तमान में ''मैं'' शरीर मात्र नहीं हूँ बल्कि परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् हूँ ।

ऐ मेरे बन्दों ! ''मैं'' लाईफ लाइट-जीवन ज्योति रूप यीशु (Jesus Christ) नहीं हूँ बल्कि यीशु (जीवन ज्योति) का परमपिता रूप (GOD-Father) 'शब्द' रूप परमेश्वर हूँ; ''मैं'' मोहम्मद व मोहम्मद वाला 'नूर' नहीं हूँ बल्कि मोहम्मद का परवरदिगार और 'नूर' का पितारूप अलम्-कादिरे मोतलक अल्लाहतआला हूँ; ''मैं'' सिध्दार्थ गौतम व उनका इनलाइटेनमेण्ट नहीं हूँ बल्कि इनलाइटेनमेण्ट का पितारूप सम्यक् ज्ञान रूप बोधिसत्त्व (सत्यबोध) हूँ ; ''मैं'' महावीर (जैन) व उनका चेतन ज्योति भी नहीं हूं बल्कि महावीर का ईष्ट और उनके चेतन ज्योति का पितारूप सर्वोच्च शक्ति-सत्ता रूप सत्य-तत्त्व 'अरिहंत' हूँ । वर्तमान में भी ''मैं'' शरीर मात्र नहीं बल्कि परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रम्ह-खुदा-गॉड- भगवान्-यहोवा-बोधिसत्त्व-अरिहंत-सत्पुरुष-परमपुरुष हूँ ।

ऐ मेरे बन्दों ! '' मैं'' यमराज, वरुण, अग्नि व इन्द्र ब्रम्हा आदि वाला ॐ (Oan) नहीं हूँ और सप्तर्षियों, नारद, शंकर आदि वाला हँऽसो व ज्योति रूप आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह भी नहीं हूं बल्कि ''मैं'' तो एकमात्र श्रीविष्णु जी वाला परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् हूं । सोऽहँ-हँऽसो का पिता हूँ ।

ऐ मेरे जिज्ञासुओं ! ''मैं'' शंकर, नारद, वशिष्ठ, अंगीरस, अथर्वा, श्वेताश्वतर, विश्वामित्र, याज्ञवल्क्य, ऋभु, भारद्वाज, लोमश, अष्टावक्र, आदि त्रेतायुगीन किसी भी ऋषि-महर्षि वाला सोऽहँ-हँऽसो व स: ज्योति तथा रावण आदि विद्वान कर्म काण्डियों-पण्डितों का ॐ (Oan) नहीं हूँ, बल्कि तथा सोऽहँ-हँऽसो व स: ज्योति रूप जीवात्मा व आत्मा का उत्पत्तिकर्ता तथा उन्हें अपने ''तत्त्वम्'' में विलय कर लेने वाला श्रीरामचन्द्र जी वाला परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप मायापति भगवान हूँ ।

ऐ मेरे प्रेम दिवानों ! ''मैं'' सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, पराशर, दुर्वाशा, शौनक, व्यास व शुकदेव आदि समस्त द्वापरयुगीन ऋषि-महर्षियों वाला सोऽहँ-हँऽसो व ज्योति तथा द्रोणाचार्य, संदीपन आदि प्रकाण्ड पण्डितों-कर्म काण्डियों वाला ॐ (Oan) भी नहीं हूं बल्कि व सोऽहँ-हँऽसो-स: ज्योति रूप जीवात्मा व आत्मा का उत्पत्ति व विलयकर्ता श्रीकृष्ण जी वाला परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रम्ह पुरुषोत्तम - सनातन पुरुष हूँ । ''मैं'' यूहन्ना वाला Self (स्व) तथा यीशु वाला Life light ( जीवन-ज्योति) भी नहीं हूं बल्कि Self (स्व) तथा Life light ( जीवन-ज्योति) का भी उत्पत्ति व विलय कर्ता रूप लाईफ-लाइट या जीवन-ज्योति यीशु का परमपिता (GOD-Father) रूप 'शब्द (बचन)' रूप परमेश्वर हूँ !

ऐ मेरे भक्त प्रेमी-जिज्ञासुओं ! ''मैं'' वर्तमान में श्री करपात्री, शंकराचार्यगण, महामण्डलेश्वरगण, देवद्रोही श्रीराम शर्मा (तथाकथित गायत्री वाले), श्री मुरारी बापू, श्री नारदानन्द, श्री सन् म्योंगमून ( दक्षिण कोरिया वाले), श्री महेश योगी, श्री आशाराम बापू, श्री साई नाथ, श्री पाण्डुरंग शास्त्री (स्वाध्यायी), आचार्य चतुर्भुज सहाय, श्री चिन्मयानन्द (वैचारिक मात्र) आदि विद्वान कर्मकाण्डियों वाला एवं 'अहं ब्रम्हास्मि' नहीं हूं तथा श्री बालयोगेश्वरजी, योगभ्रष्ट सतपाल, श्री आनन्दमूर्ति जी, निरंकारी (भ्रमकारी) बाबा श्री गुरुबचन सिंह, मां आनन्दमयी, खण्डन प्रधान धर्म का कलंक रजनीश, श्री मेंही, बड़बोल जय गुरुदेव, घोर आडम्बरी एवं मिथ्याज्ञानी प्रजापिता ब्रम्ह कुमार-कुमारियों, राधा स्वामी, श्री मुक्तानन्द, तन्त्र वाले अवधूत राम- भूतनाथ आदि वर्तमान वाले समस्त तन्त्र-मन्त्र एवं आध्यात्मिक महात्माओं वाला सोऽहँ-ज्योति रूप जीवात्मा व आत्मा भी नहीं हूं, बल्कि 'सदानन्द' शरीर वाला परमतत्त्वम् रूप ''आत्मतत्त्वम्'' शब्दरूप भगत्तत्त्वम् रूप 'शब्द' गॉड-अलम्-परमात्मा-परमेश्वर -पुरुषोत्तम - सनातन पुरुष हूँ।
मुझ परमतत्त्वम् रूप खुदा-गॉड-भगवान् को, जब-जब अपने परम आकाश रूप परमधाम-पैराडाइज-बिहिश्त से भू-मण्डल पर अवतरित होना होता है, तब-तब ''मैं'' कुछ व्यक्तियों के अन्तर्गत विशेष भौतिक ज्ञान पहले ही प्रेषित कर देता हूं, जिसके द्वारा सांसारिक विकास व भौतिक रूप से सुख-सुविधाओं से युक्त होकर मानव सुख-शान्ति से रहे । परन्तु जब वे विशिष्ट ज्ञान (भौतिक) वाले निर्माणक आविष्कारों के साथ-साथ संहारक आयुधों का निर्माण करते हुए विनाशक रूप ले लेते हैं, तब ''मैं'' खुदा-गॉड-भगवान् ही अपने कुछ विशेष शक्तियों से युक्त विशिष्ट ज्ञान (आध्यात्मिक) को प्रेषित करता हूं जिससे युक्त चमत्कारी, तान्त्रिक व साधक, ध्यानी-योगी, ऋषि-महर्षि व सन्त-महात्मा आदि हैं । ये लोग चमत्कार व आध्यात्मिक शक्ति व योग-साधना के सदुपयोग रूप शान्ति व्यवस्था करने के बजाय उसका दुरुपयोग करते हुए अहंकारी व मिथ्या ज्ञानाभिमानी बन-बनाकर, जब मनमानी करने लगते हैं --इतना ही नहीं, 'मुझ परमात्मा' की जानकारी-परिचय-पहचान रूप 'तत्त्वज्ञान' का नाम ले-लेकर अपने को 'भगवान् व अवतारी' भी कहने लगते हैं, तब ''मैं'' स्वयं भू-मण्डल पर आता हूं और किसी शरीर विशेष को अधिग्रहीत कर सत्यज्ञान रूप यथार्थत-'तत्त्वज्ञान' रूप हुरूफमुकत्तआत (खुदाई इल्म) रूप नॉलेज (True, Supreme and Perfect KNOWLEDGE) रूप सत्य धर्र्म की स्थापना करता हूं । वर्तमान में भी इसीलिए पुन: भू-मण्डल पर अवतरित होकर कार्य कर रहा हूं । किन्तु

अवजानन्ति मां मूढा: मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥

'ऐसा होने पर सम्पूर्ण भूतों के महान ईश्वर रूप मुझ परमेश्वर के परमभाव को न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ परमात्मा-परमेश्वर को तुच्छ समझते हैं अर्थात् अपनी महामाया से संसार के उध्दार के लिए मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमात्मा-परमेश्वर को साधारण मनुष्य समझते हैं ।' ---(श्रीमद्भगवद् गीता 9/11)

अत: यदि मेरी जानकारी, दर्शन तथा बात-चीत करते हुये पहचान रूप पूर्ण परिचय प्राप्त करना हो, तो मुझसे शान्तिमय ढंग से विनम्र भगवद्-शरणागत भाव से 'तत्त्वज्ञान' व 'ज्ञान-दृष्टि' से प्राप्त किया जा सकता है। गीता अध्याय 13वें का 11, 12 एवं 13वें श्लोक वाला ही विराट दर्शन व मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध भी मिलता है । साथ ही साथ श्रीविष्णु-राम-कृष्ण जी का वास्तविक (तात्त्विक) साक्षात् दर्शन भी । गरुण-हनूमान-सेवरी-अर्जुन वाला ही और वैसा ही ।

                                                                                                                                               कल्कि अवतार

विश्व बन्धुत्त्व एवं सद्भावी एकता आन्दोलन अन्तर्गत 'धर्म-धर्मात्मा-धरती' रक्षार्थ

पूरे धरती पर है कोई ऐसा ध्यानी-ज्ञानी जो इस ध्यान-ज्ञान रूप यज्ञ के 'चुनौती' रूप घोडे क़ो रोक-पकड़ (चुनौती स्वीकार) कर 'सत्यता' के निर्णय हेतु वार्ता कर सके ?

उपर्युक्त चुनौती की एक-एक प्रति प्रत्येक पूर्वोक्त तथाकथित भगवानों एवं महात्मन् बन्धुओं को भेजी गयी । साथ ही उन लोगों के अनुयायिओं को भी दी जाती रही है जिससे कि अब भी लोग तैयार हो या उन लोगों के अनुयायीगण उन लोगों को तैयार करायें या नहीं तो हमारे 'तत्त्वज्ञान रूप सत्यज्ञान' को स्वीकार करें । यह कोई सामान्य बात नहीं; इसे ही 'ज्ञान क्रान्ति' कहते है । धर्मगुरुओं के लिए प्रस्तुत चुनौती उसी रूप में है जिस तरह प्राचीनकाल में चक्रवर्ती सम्राट द्वारा अवश्मेध यज्ञ के घोड़े का छोड़ा जाना होता था । राजाओं के बीच चक्रवर्ती सम्राट को जब कोई समकक्ष नहीं दिखाई देता था, तब वे अश्वमेध यज्ञ करते थे जिसमें एक घोड़ा छोड़ा जाता था । उस घोडे क़े ललाट पर यह लिखकर कि - 'सभी लोग मेरी अधीनता स्वीकार करें, जिन्हें स्वीकार न हो, युध्दके लिए तैयार हों'--वह घोड़ा छोड़ा जाता था । उसे सभी राजा लोग स्वीकार करते थे। जिसे अस्वीकार होता था, वह घोड़े को रोककर युध्द करता था और परास्त होने के बाद स्वीकार कर लेता था । ठीक उसी प्रकार यह चुनौती समस्त तथाकथित भगवानों एवं महात्माओं के पास वैसे ही छपवाकर भेजी जा रही है कि इस 'तत्त्वज्ञान रूप भगवद्ज्ञान रूप सत्यज्ञान' को सभी तथाकथित भगवान एवं सद्गुरु-महात्मा जी लोग स्वीकार करें अन्यथा जिनको इसे असत्य ठहराना हो, वे शान्तिमय एवं निष्कपट भाव से साक्षात्कार एवं परीक्षा लेने अथवा देने के लिए तैयार हो जायें । यदि इस बार कोई तैयार नहीं होगा, तो मान लिया जायेगा कि सभी ने इस 'तत्त्वज्ञान रूप भगवद्ज्ञान रूप सत्यज्ञान' को स्वीकार कर लिया है तथा सभी लोग 'सत्यमेव विजयते' रूपी इस सत्य ज्ञान-क्रान्ति रूपी झण्डे को भी स्वीकार कर लिये हैं । यह अहंकार नहीं है अपितु भगवत् कृपा और तत्त्वज्ञान का प्रभाव है । आप अहंकार मानें या जो भी माने, यह आप की बात है, मगर है यह भगवत् कृपा और तत्त्वज्ञान का प्रभाव ही । आप वार्ता करके जाँच करके अहंकार कह दें, तब समझा जाय ।

                                                                                                                                               कल्कि अवतार

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