Only the mercy of GOD.
 कण कण में भगवान या ज़र्रे ज़र्रे में खुदा कहना मूर्खता है ।
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      हम सभी जानते हैं कि इस भौतिक जड़ जगत (माइटेरियलिस्टिक वर्ल्ड) का निर्माण अत्यंत ही सूक्ष्म कणों (परमाणु /Atoms) से मिलकर हुआ है और परमाणु निर्जीव होता है । निर्जीव, जिसमें जीव न हो। जैसे कि लोहा, तांबा, पीतल, सोना, चाँदी, आदि में कहाँ जीव होता है ? अब आप स्वयं ही अनुभव कर सकते हैं कि जिस कण कण या ज़र्रे ज़र्रे में जीव भी नहीं है उसमे परमेश्वर या खुदा की कल्पना करना कितनी बड़ी मूर्खता है ? आखिर आप लोग परमेश्वर/खुदा/गॉड को क्या समझे बैठे हैं ? क्या आप परमेश्वर को अणु या परमाणु समझे बैठे है ? कण कण में भगवान या ज़र्रे ज़र्रे में खुदा वाली बात कहना सिवाय बकबास के और कुछ भी नहीं है। वंधुवर कण कण में भगवान नहीं होता बल्कि भगवान से उत्पन्न, भगवान की शक्ति(पावर) होती है। क्योंकि शक्ति का सघन संघटित रूप ही पदार्थ (मैटर) या वस्तु होता है। अब परमेश्वर की शक्ति को ही परमेश्वर समझ लेना घोर अज्ञानता है। यदि आप यह दलील पेश करें कि प्रहलाद के लिए तो खंभे से भगवान प्रकट हुये थे, तो इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि हर कण कण में और खंभे में भगवान हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अपने भक्त के लिए भगवान कहीं भी और किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं। सद्ग्रंथों में भी भगवान/खुदा/गॉड के परमधाम/ बहिस्त/ पाइरडाइस में रहने की बात कही गई है।
       प्राय: यह देखा जाता है कि योगी साधक अथवा आध्यात्मिक लोग घट घट में भगवान के स्थित होने की घोषणा कर देते हैं । जबकि वास्तविकता तो यह है कि घट घट में भगवान होने की बात तो छोड़िए, इस ब्रह्मांड में भी भगवान नहीं रहता ।
       परमेशवर/खुदा/गॉड तो वास्तव में इस जड़ जगत और ब्रह्मांड से भी परे परम आकाश रूप परमधाम में रहते रहते हैं। क़ुरान शरीफ़ में भी अल्लाहतला के बहिस्त में रहने कि बात कही गई है। उसमें यह भी लिखा है कि अल्लाहतला हाज़िर नाज़िर होगा । हाज़िर का मतलब है उपस्थित होना या सामने आना। जब खुदा ज़र्रे ज़र्रे में है तो फिर आने कि बात क्यों कही गई है ? जब खुदा ज़र्रे ज़र्रे में है तो आपके अंदर भी खुदा है और मेरे अंदर भी खुदा है, फिर एक ख़ुदा दूसरे ख़ुदा को क्या समझाने की कोशिश कर रहा है? इस शरीर में जीव (रूह/self) भी तभी तक स्थित रह सकता है जब तक आत्मा (सोल/नूर) हर स्वांस(ब्रीथ) के साथ शरीर में प्रवेश करता रहे, अर्थात स्वांस के साथ शरीर में प्रवेश करने वाली आत्मा पर ही जीव निर्भर है, और वह आत्मा शरीर के अंदर नहीं बल्कि बाहर से आता है, और प्रवेश करने के बाद गुण दोष से आवृत्त होकर जीव(सूक्ष्म शरीर) रूप में परिवर्तित होकर शरीर में क्रियाशील होता रहता है । यह क्रिया शरीर में लगातार चलती रहती है अर्थात ख़ुदा से पैदा होने वाला नूर, स्वांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर रूह में परिवर्तित हो जाता है। तब आप स्वयं ही अनुभव करें कि जब ख़ुदा/गॉड/परमेश्वर से उत्पन्न आत्मा(सोल/नूर) ही इस शरीर में नहीं रहता तो फिर स्वयं परमेश्वर के इस शरीर में होने की बात कहना कितना बड़ा पाखंड है ? जितने भी लोग घट घट में भगवान, कण कण में भगवान या ज़र्रे ज़र्रे में ख़ुदा के होने की बात करते हैं हकीकत तो यह है कि इन लोगों को, भले ही वे योगी, सिद्ध-साधक-आध्यात्मिक तथाकथित सन्त महात्मा ही क्यों न हों, परमात्मा-परमेश्वर-ख़ुदा-गॉड-भगवान-सत सीरी अकाल-यहोवा-सत्पुरुष-परमपुरुष के संबंध में बिल्कुल ही जानकारी नहीं रहती। इन लोगों को यह पता ही नहीं कि आत्मा बाहर कहाँ से आकर शरीर में प्रवेश करता है ? ऐसे लोग समाज को भ्रमित करने का काम करते हैं। अतः आप लोग इस प्रकार की झूठी मान्यता को छोड़ कर परमेश्वर के वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करें और अपने जीवन के मूल उद्देश्य को प्राप्त करें ।
                                                                                                                                    
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