Only the mercy of GOD.
 इस सत्य को जानिए
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- जीव, ईश्वर और परमेश्वर तीनों अलग अलग होते हैं ।
या
- जीव, आत्मा और परमात्मा तीनों अलग अलग होते हैं ।
या
- जीव, ब्रह्म और परमब्रह्म तीनों अलग अलग होते हैं ।
या
- रूह, नूर और अल्लाहतला तीनों अलग अलग होते हैं ।
या
- Self, Soul(Devine Light) और GOD तीनों अलग अलग होते हैं ।

= जीव, रूह और सेल्फ ये एक ही हैं अर्थात समानार्थी हैं।
= आत्मा, ईश्वर, ब्रह्म, नूर, Soul (Devine Light) ये सब एक ही है अर्थात समानार्थी हैं।
= परमात्मा, परमेश्वर, परमब्रह्म, खुदा, अल्लाहतला, GOD, अकाल पुरुष, यहोवा ये सब एक ही है अर्थात समानार्थी हैं।
          इस प्रकार जीव, ईश्वर और परमेश्वर तीनों को एक ही कहना अज्ञानता है। जीव को ही आत्मा और आत्मा को ही परमात्मा कहना मूर्खता है। आत्मा(नूर) परमात्मा(अल्लाहतला) से पैदा होने वाला केवल एक अंश है । जैसे सूर्य की किरणें सूर्य से पैदा होती हैं। अब सूर्य की किरणों को ही सूर्य समझ लेना कहाँ की बुद्धिमानी है ? तात्पर्य यह है की किरणें सूर्य नहीं हैं बल्कि सूर्य का अंश हैं और सूर्य से पैदा होती हैं। अगर आपके कमरे में सूर्य की किरणें पड़ रही हैं तो इसका मतलब यह नहीं हुआ की सूर्य आपके कमरे में आ गया है। इसी प्रकार आत्मा(सोल या नूर) भी परमेश्वर(अल्लाहतला) से पैदा होता है। साधारणतः लोग अल्लाहतला को नूर समझ लेते हैं जबकि सच्चाई यह है की अल्लाहतला तो नूर को पैदा करने वाला है। वह खुद तो नूर से भी परे है। नूर तो मुहम्मद साहब थे। अब अल्लाहतला को भी नूर कहना कितनी गलत बात है ? जबकि दोनों में कोई बराबरी नहीं है। ईसामसीह भी परमेश्वर के पुत्र अर्थात Devine Light थे, वे स्वयं परमेश्वर नहीं थे। इसी प्रकार कबीर, गुरुनानक देव, महावीर जैन, शिरडी वाले साई बाबा आदि ये सब भी आत्मा, ईश्वर या ब्रह्म की श्रेणी में आते हैं। इनमें से कोई भी परमात्मा, परमेश्वर या परमब्रह्म नहीं है। परमेश्वर तो ईश्वरों का भी ईश्वर है, ब्रह्म का भी ब्रह्म, परमब्रह्म है।
          वास्तव में परमात्मा से पैदा होने वाला आत्मा प्रत्येक स्वांस के साथ शरीर में प्रवेश करता रहता है। जैसे ही स्वांस के माध्यम से आत्मा शरीर में प्रवेश करता है, वैसे ही वह गुण दोष से आव्रत होकर परिवर्तित होकर ‘जीव(रूह)’ बन जाता है। इस प्रकार शरीर के अंदर आत्मा का गुण दोष से युक्त, परिवर्तित रूप ‘जीव’ रहता है । विशुद्ध आत्मा शरीर के अंदर नहीं रहता । सुख दुख का आभास और कर्मफल का भोग ये सब जीव(रूह) ही करता है क्योंकि आत्मा पर सुख दुख का कोई प्रभाव नहीं पड़ता । जन्म, मरण, कर्म, भोग आदि ये सब जीव का काम है आत्मा का नहीं। आत्मा तो इन सब से परे होता है। यह जीव ही होता है जो शरीर में रह कर कर्म-फल और सुख-दुख भोगता है। जीव एक ड्राईवर की तरह इस शरीर को चलाता रहता है। आत्मा जीव और परमेश्वर के बीच में काम करता है। जीव के अस्तित्व को शरीर में बनाए रखने का काम आत्मा का होता है। जीव तभी तक शरीर में रहता है जब तक आत्मा शरीर में प्रवेश करता रहता है। जब आत्मा शरीर में प्रवेश करना बंद कर देता है तो जीव उस शरीर को छोडकर किसी दूसरे शरीर में चला जाता है। यह क्रम तब तक लगातार चलता रहता है जब तक जीव अपने वास्तविक मूल अवस्था को प्राप्त नहीं कर लेता अर्थात परमेश्वर में विलय नहीं हो जाता । वास्तविक जानकारी न होने की वजह से लोगों ने सब अर्थ का अनर्थ कर दिया है। वास्तव में ये जितने भी आध्यात्मिक लोग हुये हैं, इन्हे सिर्फ आत्मा, ईश्वर या ब्रह्म की ही जानकारी थी क्योंकि अध्यात्म के द्वारा सिर्फ ईश्वर को ही जाना जा सकता है, जीव और परमेश्वर को नहीं। क्योंकि जीव को जानने का विधान है स्वाध्याय(Self Realization) और परमेश्वर को जानने का विधान है तत्वज्ञान(Perfect Knowledge या खुदाई इल्म)। हर चीज को जानने और समझने का एक विधान होता है, उसी विधान के द्वारा ही उस चीज को जाना और समझा जा सकता है। ये जितने भी संत-महात्मा, पीर, पैगम्बर आदि हुये हैं, ये सब आध्यात्मिक लोग थे।
          योग, साधना, ध्यान, समाधि आदि ये सब अध्यात्म के अंतर्गत आते हैं और अध्यात्म की अंतिम उपलब्धि है आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म या नूर का दर्शन । इससे अधिक और कुछ नहीं । जब इन आध्यात्मिक लोगों को इससे अधिक कुछ और मिला ही नहीं तो जो मिला उसी को सब कुछ घोषित कर दिया। ईश्वर को ही परमेश्वर समझने लगे, जीव को ही आत्मा समझने लगे जिससे सब अर्थ का अनर्थ हो गया। लेकिन परमेश्वर की कृपा से अब वह समय आ गया है इन झूठी मान्यताओं को छोडकर सत्य को स्वीकार करने का वरना विनाश बहुत तेजी से समीप आ रहा है।
                                                                                                                                    
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