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  मैं कौन हूँ ?
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       इस सृष्टि का पहला और सबसे महत्वपूर्ण सवाल, जिसका जवाब ढूंढने की कोशिश हमारे वैज्ञानिकों ने आज तक नहीं की ! आज वैज्ञानिक मंगल पर पानी को खोज रहा है लेकिन उसने कभी अपने आप को खोजने की कोशिश नहीं की कि वह स्वयं कौन है ? क्या करोगे इस पानी का जब इसे पीने के लिए कोई इंसान ही नहीं बचेगा ? इस दुनिया को विनाश के कगार पर पहुँचाने में हमारे वैज्ञानिकों का बहुत बड़ा योगदान रहा है । उन्होने परमाणु बम बनाने की तकनीक तो खोज ली लेकिन कभी यह नहीं खोजा कि इंसान रास्ते से भटक क्यों गया ? इंसान के भटकने का मुख्य कारण है उसे अपनी मंज़िल का पता न होना। स्वयं विज्ञान भी अपने रास्ते से भटक गया है, तभी तो उसने विनाशकारी हथियारों का ज़ख़ीरा खड़ा कर लिया है ! और अब उसे चिंता हो रही है दुनिया को विनाश से बचाने की ! क्योंकि अब इसे अपना अस्तित्व ख़तरे में नज़र आ रहा है। समस्या पैदा करके उसका समाधान ढूंढने को ही विज्ञान अपनी उपलब्धि मानता है। विज्ञान की वास्तविक उपलब्धि तो तब होती जब वह इंसान को उसकी वास्तविक पहचान और उसकी मंज़िल बताता । तब दुनिया की ये हालत न होती।

       मैं कौन हूँ ? एक ऐसा प्रश्न है जिसके उत्तर के बाद ही शुरू होती है इंसान की असली ज़िंदगी ! तो फिर अभी तक जो ज़िन्दगी जी रहे हैं क्या वो इंसान की असली ज़िन्दगी नहीं है ?

       बिल्कुल सीधी सी बात है कि अगर आपको कम्प्युटर की जानकारी नहीं है और आपको कम्प्युटर पकड़ा दिया जाए तो क्या आप कम्प्युटर को ठीक प्रकार से प्रयोग कर पायेंगे? नहीं । इसके लिए आपको कम्प्युटर की ठीक से जानकारी होनी आवश्यक है। आपको पता होना चाहिए कि कम्प्युटर किसे कहते हैं और यह किस काम आता है। अगर कम्प्युटर जैसी श्रेष्ठ मशीन का प्रयोग सिर्फ फिल्म देखने के लिए किया जाए तो कम्प्युटर और टीवी में क्या अन्तर रह जाएगा ? ये कम्प्युटर का दुरुपयोग ही कहलाएगा। कारण सिर्फ अज्ञानता । किसी भी मशीन को ठीक से प्रयोग करने के लिए उस मशीन की ठीक से जानकारी होना जरूरी है। इसीलिए प्रत्येक मशीन के साथ उसका मैनुअल दिया जाता है जिसमें उस मशीन का परिचय और उसके प्रयोग करने कि विधि के साथ पूरा विवरण दिया जाता है ।

       मनुष्य इस धरती का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है तो जरा सोचिए कि आखिर वह क्या चीज है जो सिर्फ मनुष्य के पास है और दूसरे प्राणीयों के पास नहीं है। क्या इंसान सिर्फ भय, निद्रा, आहार और मैथुन जैसे कामों को करने के लिए पैदा हुआ है ? नहीं ! क्योंकि ये काम तो जानवर भी करते हैं, फिर हम उनसे श्रेष्ठ कैसे ? हम कैसे कह सकते हैं कि हम मनुष्य का जीवन जी रहें हैं ? कारण है सिर्फ अज्ञानता। जब तक इंसान यह नहीं जानेगा कि वह कौन है, वह यह कैसे जानेगा कि उसे करना क्या है ? हैरानी की बात तो यह है यह विज्ञान जो प्रकर्ति के रहस्यों से पर्दा हटाने के प्रति इतना लालायित रहता है, इसने कभी इस सवाल का जवाब ढूंढने कि कोशिश नहीं की। जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि हर इंसान दुनिया कि तमाम दूसरी चीजों को जानने से पहले अपने बारे में जाने कि वह कौन है ?

       आप अपने आपको शरीर समझते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि आप शरीर नहीं हैं बल्कि यह शरीर आपका है और आप इस शरीर को चलाने वाले एक ड्राईवर हैं। आप और आपका शरीर दोनों दो चीजें हैं। शरीर एक गाड़ी कि तरह है और आप इसके ड्राईवर हैं। जरा ध्यान दीजिये कि जीवित शरीर और मृत शरीर में क्या अन्तर होता है ? मेडिकल साइन्स के अनुसार दोनों में कोई अन्तर नहीं है क्योंकि निर्जीव शरीर में भी वे सारे तत्व मौजूद हैं जो कि एक जीवित शरीर में होते हैं। फिर वह कौन सी चीज है जिसके न रहने से वह निर्जीव हो गया है ? वह है ‘जीव’ (रूह या Self) । जीव जब तक इस शरीर में रहता है तब तक यह जीवित कहलाता है और जब इस शरीर को छोडकर चला जाता है तो यह शरीर निर्जीव कहलाने लगता है। सजीव अर्थात जीव सहित और निर्जीव अर्थात जीव रहित । जीव इस शरीर को चलाने का काम करता है आप वही जीव हैं। गड़बड़ी तब शुरु होती है जब आप अपने आपको शरीर समझने लगते हैं। अगर आप शरीर हैं तो वह कौन है जो मरने के बाद इस शरीर को छोडकर चला जाता है ? वह कौन है जिसे सुख दुख का आभास होता है ? क्योंकि निर्जीव शरीर में तो कोई सुख दुख का आभास नहीं होता। अगर आप शरीर हैं तो “ यह मेरा शरीर है “ ऐसा कहने वाला कौन है ? मैं और मेरा शरीर दोनों अलग अलग चीजें हैं। आप अगर किसी मकान में रहते हैं तो आप यह कहते हैं कि यह मेरा मकान है, यह नहीं कहते कि मैं मकान हूँ।

       शरीर परिवर्तनशील है और लगातार बदलता रहता है लेकिन आप वही रहते हैं। आपका जो शरीर बचपन में था वह अब नहीं रहा लेकिन आप वही हैं। बचपन में दूसरा शरीर था, जवानी में दूसरा शरीर है और बुडापे में दूसरा शरीर होगा लेकिन आप वही रहेंगे। मेडिकल साइन्स के अनुसार भी प्रत्येक सात वर्ष में हमारा शरीर पूरी तरह से बदल जाता है अर्थात शरीर की पुरानी समस्त कोशिकाएँ समाप्त होकर नई कोशिकाएँ बन जाती हैं। इस प्रकार एक ही जीवन में आप अनेक शरीर बदलते हैं लेकिन आप वही रहते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि आप शरीर नहीं हैं बल्कि शरीर के अंदर रहने वाले जीव हैं और यह शरीर आपको दी गई है जिससे कि आप अपने वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर सकें । अब प्रश्न यह उठता है कि आपका वास्तविक लक्ष्य या असली मंज़िल क्या है ? आपका अर्थात जीव का लक्ष्य कमाने खाने और जुटाने में लगे रहना नहीं है। कमाना खाना और तमाम भौतिक सुख साधन ये सब शरीर कि जरूरत है, आपकी नहीं। क्योंकि आप जीव हैं इसलिए ये सब आपकी ज़रूरतें नहीं है। जैसे आपको अगर दिल्ली जाना है तो आपको उसके लिए एक गाड़ी दी जाती है। अब गाड़ी की जरूरत है ईंधन, इसलिए उसमें ईंधन डालना जरूरी है लेकिन ईंधन आपकी जरूरत नहीं है। आपकी जरूरत या लक्ष्य है दिल्ली पहुँचना। अगर आप ईंधन को अपनी जरूरत मानकर पूरी जिंदगी ईंधन जुटाने में ही लगे रहेंगे तो कभी दिल्ली नहीं पहुँच पायेंगे । इसी प्रकार जब आप अपने आपको शरीर मानकर, कमाने खाने को ही अपना लक्ष्य मानकर जिंदगी भर इन्ही कामों में लगे रहेंगे तो अपनी अर्थात जीव की मंज़िल को कैसे प्राप्त करेंगे ? और जब मंज़िल नहीं मिलेगी तो वह संतुष्टि और शांति कैसे मिलेगी जिसकी तलाश में आप भटक रहे हैं ?

       दुनिया में आज इंसान कि दिनो दिन बड़ती परेशानी और तनाव का कारण भी यही है कि शरीर कि जरूरतों को अपनी जरूरत मानकर उन्ही के पीछे लगा हुआ है और अपनी मंज़िल से दूर होता जा रहा है।

       अब बात करते हैं कि जीव कि मंज़िल क्या है ? उसकी ज़रूरतें क्या है ? आपने कभी सोचा है कि हर इंसान supremacy चाहता है और हमेशा सुख में रहना चाहता है। हर व्यक्ति यह चाहता है कि वह पूरी शक्ति के साथ हमेशा जीवित रहे, सदा सुखी रहे, श्रेष्ठ और उन्मुक्त जीवन जिये । संक्षेप में कहें तो हर व्यक्ति उन्मुक्तता(मुक्ति या फ्रीडम), अमरता और आनंद चाहता है। वास्तव में यही जीव की मंज़िल है। जीव उस अवस्था को पाना चाहता है जिसमें मृत्यु का भय न हो, उन्मुक्तता हो और आनंद हो। अब सवाल यह है कि जीव इस अवस्था को क्यों पाना चाहता है?

       जीव इस अवस्था को इसलिए पाना चाहता है क्योंकि इस दुनिया में आने से पहले वह उसी अवस्था में था और दुनिया में आने के बाद वह अपनी उसी मूल अवस्था को पाना चाहता है और उसे जब वह अवस्था नहीं मिलती है तो परेशान हो जाता है। सारी गड़बड़ी तब पैदा हुई जब आप अपने आपको शरीर मानकर शरीर कि जरूरतों को पूरा करने में लग गए और अपनी(जीव) की जरूरत कि तरफ ध्यान ही नहीं दिया। जबकि ये शरीर आपको इसलिए मिली थी कि इसकी सहायता से आप अपनी मूल अवस्था को प्राप्त करें न कि इसलिए कि इस शरीर रूपी गाड़ी के लिए ईंधन जुटाने में ही पूरी जिंदगी बर्बाद कर दें।

       जीव की वास्तविक मूल अवस्था को प्राप्त करने के लिए यह जानना जरूरी है कि उसको प्राप्त करने का तरीका क्या है ? बादलों से निकली हुई पानी की एक बूंद तब तक अपनी वास्तविक अवस्था में नहीं पहुँचेगी जब तक कि वह वापस समुन्द्र में जाकर न मिल जाए, क्योंकि बादलों का रूप लेने से पहले वह समुन्द्र में ही थी। इसी प्रकार उस सर्वशक्तिमान परमेश्वर से अलग हुआ यह जीव तब तक अपनी मूल अवस्था को प्राप्त नहीं हो सकता जब तक वह वापस उस परमेश्वर में विलय न हो जाए। इस रूह को तब तक चैन नहीं मिल सकता जब तक कि वह अल्लाहतलाह में न समा जाए। वास्तव में यह जीव उस परमपिता परमेश्वर का ही अंश है। वह परमेश्वर जहाँ अमरता है, मृत्यु नहीं, उन्मुक्तता है कोई बंधन नहीं है और आनंद का सागर परमानंद है। जरा सोचिए उस परमेश्वर का अंश होने के बावजूद भी ये कैसा जीवन जी रहे हैं हम, जहाँ एक पल के सुकून के लिए तरस गए। हम वहाँ आनंद के सागर में डुबकी लगा रहे थे और यहाँ एक पल के आनंद के लिए तरस रहे हैं। हम वहाँ अमरत्व को प्राप्त थे और यहाँ हर पल मृत्यु का भय सता रहा है। हम वहाँ पूरी तरह से मुक्त थे और यहाँ हर तरफ से बंधनों में जकड़े हुये हैं। ये कैसा जीवन है ? कारण सिर्फ यही है कि अपने आप को भूल गए और अपने आप को शरीर मान बैठे। हमारे अंदर supremacy की चाहत है, यह इस बात का प्रमाण है कि हम उस supreme का अंश हैं । हमारे अंदर मुक्त और अमर होने कि चाहत है, यह इस बात का प्रमाण है कि हम मुक्ति और अमरता प्रदान करने वाले उस परमेश्वर के अंश हैं। हमारे अंदर आनंद की चाहत है, यह इस बात का प्रमाण है की हम आनंद के सागर उस सच्चिदानंद भगवान के अंश हैं।

       अब कमरे के बाहर रखी हुई वस्तु को कमरे के अंदर ढूंढेगे तो क्या मिलेगी ? कभी नहीं। परमेश्वर से प्राप्त होने वाली उपलब्धि को दुनिया की चीजों में ढूंढेगे तो कभी नहीं मिलेगी। शरीर का सबंध इस भौतिक संसार से है और जीव का संबंध परमेश्वर से है। संसार और शरीर नश्वर है। यह शरीर हर पल मृत्यु की ओर जा रहा है। जबकि परमेश्वर इस सृष्टि के आदि में भी था और सृष्टि के बाद भी रहेगा। अर्थात पूरी सृष्टि में एकमात्र परमेश्वर ही है जो की अमर है और अमरता प्रदान करने वाला है। तो फिर बुद्धिमानी किस काम में है ? इस संसार और शरीर के चक्कर में पड़कर विनाश की तरफ जाने में या फिर परमेश्वर के चक्कर में पड़कर अपने वास्तविक लक्ष्य या मूल अवस्था को प्राप्त करने में ? और हाँ ऐसा करने की क्षमता सिर्फ मानव के पास है इसीलिए इसे दूसरे प्राणीयों से श्रेष्ट कहा जाता है। अब फैसला आपका !

                                                                                                                                    
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