Only the mercy of GOD.
  विलक्षण शंका समाधान भाग-1
 प्रश्न : क्या भूलवश ऐसा अहंकार हो सकता है कि हमने प्रभु को सर्वस्व अर्पण कर दिया?
 उत्तर : नहीं हो सकता। यदि अभिमान होता है तो वास्तव में पूर्ण समर्पण हुआ ही नहीं। पदार्थों को भूल से अपना माना हुआ था, वह भूल मिट गई तो अभिमान कैसा ?
 प्रश्न : एक तो भगवान अवतार लेकर लीला करते हैं और दूसरा, संसार में जो कुछ भी हो रहा है, वह सब भगवान की लीला है – दोनों में क्या फर्क है ?
 उत्तर : अवतार की लीला एकदेशीय होती है और उसमें भगवान के भाव की मुख्यता है। होने वाली लीला सर्वदेशीय होती है और उसमें भक्त के भाव की मुख्यता है।
 प्रश्न : अहंकार का मिटना कठिन क्यों दिखता है ?
 उत्तर : स्वयं को शरीर मानकर संयोगजन्य सुख की इच्छा के कारण ही अहंकार का मिटना कठिन दिखता है। मैं हमेशा जीता रहूँ और सुख सुविधा से रहूँ- इसी पर अहंकार टिका रहता है।
 प्रश्न : ‘मैं ज्ञानी हूँ’ और ‘मैं भक्त हूँ’ – दोनों में अहंकार भाव तो समान है फिर अन्तर क्या है ?
 उत्तर : अन्तर यह है कि भक्ति में तो भगवान का सहारा है, पर ज्ञान में किसका सहारा हैं ? भगवान का सहारा रहने के कारण भक्त में कुछ कमी भी रह जाय, तो भी उसका पतन नहीं होता।
 प्रश्न : बिना अहंकार के कोई गलत कर्म हो जाय और अहंकारपूर्वक कोई शुभ कर्म हो जाय तो दोनों में क्या ठीक है ?
 उत्तर : अहंकार रहित होने पर तो कोई भी कर्म लागू ही नहीं होता, पर अहंकार के रहते हुये शुभ कर्म भी बंधन कारक हो जाता है।
 प्रश्न : सांसारिक सुख और पारमार्थिक आनन्द में क्या अन्तर है ?
 उत्तर : सांसारिक सुख दुःख की अपेक्षा से है अर्थात सांसारिक सुख के साथ दुःख भी है। परन्तु आनन्द निरपेक्ष है, उसके साथ दुःख का मिश्रण नहीं है। सांसारिक सुख में विकार है, पर आनन्द निर्विकार है। सांसारिक विषयेन्द्रिय – संयोगजन्य है, पर आनन्द संयोगजन्य नहीं है। अतः सांसारिक सुख में तो क्षणिक उबाल है, पर आनन्द में क्षणिक उबाल नहीं है, बल्कि वह सम, एकरस, शान्त, निर्विकार है। तात्पर्य यह है कि विकार, दुःख, परिवर्तन, कमी, हलचल, विक्षेप, विषमता, पक्षपात आदि का न होना ही ‘आनन्द’ है।
 प्रश्न : कर्तव्य का पालन कठिन क्यों दीखता है ?
 उत्तर : कर्तव्य कहते ही उसे हैं, जिसे किया जा सके और जिसे करना चाहिए। जिसे नहीं कर सकते, वह कर्तव्य नहीं होता। अतः कर्तव्य का पालन सबसे सरल है। अकर्तव्य की आसक्ति के कारण ही कर्तव्य पालन कठिन दीखता है।
 प्रश्न : कर्तव्य- अकर्तव्य का ज्ञान न होने का क्या कारण है ?
 उत्तर : पक्षपात, विषमता, ममता, आसक्ति, अभिमान – इनके रहने से ही कर्तव्य-अकर्तव्य का स्पष्ट ज्ञान नहीं होता।
 प्रश्न : भक्तिमार्ग में कर्म दिव्य कैसे होते हैं ?
 उत्तर : भगवान में ज्यादा तल्लीन होने से भक्त के कर्म दिव्य हो जाते हैं। मीराबाई का तो शरीर भी दिव्य होकर भगवान में विलीन हो गया था।
 प्रश्न : गीता में भगवान ने कहा है कि मेरा स्मरण कर और युद्ध अर्थात कर्तव्य-कर्म भी कर। यदि भगवान का स्मरण करेंगे तो कर्तव्य-कर्म ठीक नहीं होगा और कर्तव्य-कर्म में मन लगायेंगे तो भगवान का स्मरण नहीं होगा, अतः दोनों एक साथ कैसे करें ?
 उत्तर : प्रत्येक कार्य मन लगाकर करना चाहिए, पर उद्देश्य भगवान का होना चाहिए। प्रत्येक कार्य को भगवान का ही कार्य मानकर करना चाहिए। गहने बनाते समय सुनार के भीतर ‘यह सोना है’ यह बात बैठी रहती है। इसी तरह कार्य करते समय कार्यों को परमात्मा को अर्पित करते हुये, ‘सब कुछ परमात्मा का ही है’ यह बात बैठी रहनी चाहिए।
 प्रश्न : क्रिया, कर्म, उपासना और विवेक – इन चारों में क्या अन्तर है ?
 उत्तर : ‘क्रिया’ फलजनक नहीं होती अर्थात किसी परिस्थिति के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ती। ‘कर्म’ फलजनक होता है अर्थात सुखदायी-दुःखदायी परिस्थितियों के साथ सम्बन्ध जोड़ता है। ‘उपासना’ भगवान के साथ सम्बन्ध जोड़ती है। ‘विवेक’ जड़ता से सम्बन्ध विच्छेद करता है।
 प्रश्न : आजकल पाखण्डी साधुओं का अधिक प्रचार क्यों होता है ?
 उत्तर : इसमें कलियुग सहायता करता है। यदि पाखण्डी साधुओं का प्रचार नहीं होगा तो कलियुग कैसे कहलाएगा ? वास्तव में पाखण्डी साधुओं का प्रचार केवल एक हवा के झोंखे की तरह होता है, जो स्थायी नहीं होता। असली साधु का प्रचार स्थायी होता है। उसके द्वारा लोगों का स्थायी और असली हित होता है। जिसके भीतर थोड़ी सी भी भोग वासना होती है, उसके द्वारा लोगों का असली हित नहीं होता।
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